Thappad थप्पड़

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Thappad थप्पड़

ट्रफिक जाम में फँसे-फँसे घंटों की खीज को दबाने हेतु, मेरा पूरा ध्यान अपनी साँस को नार्मल करने में ही लगा था कि बगल वाली कार की विंडो सीट पर बैठी महिला की सुबकने की आवाज़ सुनाई दी. वो सुबक-सुबककर क्या कह रही थी, इसका तो पता नहीं, लेकिन उसकी रोनी आवाज़ और टूटे-फूटे शब्दों से मैनें जो देखा वो किसी अचम्भे से कम नहीं था, “अरे! ये इस वक्त, ये यहाँ कैसे? वो भी कार में? इसे तो बेड पर होना चाहिए, तो फिर यहाँ आई कैसे?”

ये तो वही लड़की है जिसे मैं बालकनी में खड़ा-खड़ा घंटों इस मरज़ से देखा करता कि कमसकम एक बार तो पीछे मुड़कर देखें, लेकिन कमबख्त इतनी सीधी मालूम पड़ती है कि लाख भूखा रह जाए पर किसी घास की ओर देखती तक नहीं, बिलकुल गाय समझो गाय.   

तकलीफ़… तकलीफ़ की छवि उतरते ही मेरे अंदर गत रात की मंज़र ताज़ा हो गई, न जाने कमीना उस बेचारी को किस बात पर खड़ी-खोटी सुना रहा था, दूर होने के कारण कुछ सुन तो नहीं पाया, लेकिन खिड़की के सीसे पर अंकित छाया को देखकर इतना तो ज़रूर समझ गया कि हो न हो आज फ़िर नशे में धुत होकर उस बेचारी पर लांछन लगाया जा रहा है, “कमरे में कौन था? किसे छुपा रखी है अपनी गोद में? ये बच्चा किसका है? ये पैरों का निशान किसका है? ये चड्डी किसका है? जल्दी बोल हरामजादी… चुप क्यों है? किसे देखकर हँस रही थी?”

आज के जमाने में भी इतनी गाय बने रहता है, भला कोई! “रोज़ अपने मर्द से मार खाए और बदले में उफ़्फ़ तक न करे, जो बोले चुपचाप सुन लिया करे, बिना मीनमेख कर दिया करे,” जबकि वो हैवान दिन-रात इसे तकलीफ़ ही पहुँचाता फिरे.

इतना सब देखकर मुझसे रहा नहीं गया और सीधे उसे बचाने उसके घर की तरफ़ बढ़ा, जहाँ बालकनी से निकलते रौशनी के निचे उसकी हलक से निकलती कराह और थप्पड़-चांटों के बीच “आह्ह्ह… उह्ह्ह… प्लीज़ छोड़ दो… कोई नहीं था अंदर… उह्ह… किसी के साथ कोई चक्कर नहीं है मेरा… आह्ह… हाथ जोड़ती हूँ… तुम्हारे पैर पकडती हूँ… उंहहह, आह्ह्ह” को सुनते ही मेरे आँखों में निर्वस्त्र लेटी हुई सारी तस्वीर दिखने लगी “किस तरह वो ज़बरदस्ती… भूखे गिद्ध की तरह उसकी एक-एक बोटी को नोंच खा रहा है और वो बदले में विरोध तक नहीं कर पा रही.

ट्रेफ़िक जाम हटते ही झट से मेरा ध्यान हटा और तेज़ी से किक मारकर दो कदम आगे बढने को ही हुआ, कि पीछे से फ़िर से उसकी आवाज़ सुनाई दी, लेकिन इस बार सुबकने की नहीं, बल्कि गिड़गिड़ाकर कुछ कहने की थी, जो मेरे कानों तक पहुँचने से पहले लोगों के हो-हल्ला और मोटर-कारों के कर्कश आवाज़ के बीच धूमिल हो गई.

“क्या हुआ?” पीछे मुड़कर देखना, जानने के लिए, का कोई मतलब नहीं था, क्योंकि मुझे देर हो रही थी, सो मैं चलना जारी रखा, लेकिन पता नहीं कहाँ से सरककर खून से सनी आँख मेरे पैर से टकराई, एकदम से मैं वहीं जम गया.

“बेचारी जितनी बेचारी लग रही है, उससे कहीं ज़्यादा खतरनाक है… क्या कोई किसी को इतनी बेहरमी से मार सकता है भला, कि उसके एक-एक अंग को काटकर इतना छोटा कर दे कि एक छोटे से बैग में समा जाए पूरा का पूरा.”

इतना सुनते ही मेरे आँखों के सामने फ़िर से गत रात का मंज़र ऐसा छाया कि मेरा करेजा धक् से रह गया, मैं स्पस्ट देख पा रहा था कि आख़िर फच-फच जैसी आवाज़ किस बात की आ रही है… बड़े ही चालाकी से वो सयानी लोमड़ी की तरह  गद्दे के निचे से चाकू निकाली और बड़े ही बेतरतीबी से दिल में जितना गुस्से और दर्द का गुबार छुपा था, उतने वेग से उसके लगे में दे दना-दन घोंप दी और तबतक न रुकी… जबतक की उसके हाथ न थक गए…

लेकिन दर्द और गुस्से का कसक अब भी अंदर तक जमा था, जिसे निकलना बाकि था… सो बिना कुछ सोचे वो खून से सने हाथ से मुँह पोछी और लम्बी-गहरी साँसे लेते हुए उसी फुर्ती से सब्जी काटनेवाली मामूली चाकू से गिद्ध की तरह नोंच-नोंचकर पुरे शरीर के इतने टुकड़े कर दी कि शरीर के मांस और हड्डी का कोई मेल-जोल ही नहीं बैठ पा रहा था, की आखिर कौन सी हड्डी कौन से टुकड़े से जुड़ी थी.

इससे पहले कि मैं ये सब देखकर, मुर्छित होकर गिरता, झट से किनारे लगाकर बाइक से उतरा और आनन-फानन में बाटर-बोटल निकालकर पानी की घूँट पिने लगा.

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